कितनी हसरत से..
कितनी हसरत से तुझे दिल में बसाया था मैंने....
महल सपनों का तेरे लिए सजाया था मैंने....
आज तू जा रहा है तो जैसे रूह अलग हो रही हो मेरी....
तूझे दिल में नहीं अपनी सासों में बसाया था मैंने....
कभी तू ये ना सोच ले के मुझे तेरे जाने का गम नहीं....
तेरे जाने के बाद छुपकर आसूं बहाया था मैंने....
तू तो अपनी मजबूरियाँ बताकर चला गया यहाँ से....
तेरे जाने के बाद जैसे बिना सासों के खुद को जीना सीखाया मैंने....
लोग कहते हैं के इश्क किसी को कुछ देता नहीं....
मगर देख दर्द तनहाई गम कितना पाया है मैंने....
आज भी कायम हूँ अपने वादे पर मैं....
तेरे सिवाय किसी को ना साथी बनाया मैंने....